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Sunday, August 29, 2010

खतरे में हिमालयी क्षेत्र का जनजीवन

हिमालयी क्षेत्र के आबादी वाले गांवों के भू-वैज्ञानिक सर्वे की जरुरत
(रुद्रपुर से, जहांगीर राजू)

सुमगढ़ की घटना ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता व विषम परिस्थितियों में रह रहे लोगों की हकीकत को बयां किया है।

हिमालयी क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियों व संवेदनशील भूगर्भीय संरचना के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों के हो रहे अंधाधुंध दोहन के चलते हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और अधिक बढ़ती जा रही है। परिणामस्वरुप में क्षेत्र में हर वर्ष आपदा के रुप में बड़ी-बड़ी घटनाएं सामने आ रही हैं। 
18 अगस्त बागेश्वर जिले के सुमगढ़ गांव में बादल फटने से स्कूल के 18 मासूमों का जिंदा दफन हो जाना हमें हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता से रुबरु कराता है। पिछले वर्ष 8 अगस्त को मुनस्यारी के ला झकेला गांव में हुई बादल फटने की घटना ने पूरे गांव को जमींदोज कर दिया था। इस घटना में 48 लोग मारे गए थे, जिसमें से अबतक घटना में मारे गए लोगों के शव नहीं मिल पाए हैं। ऐसे में हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पुर्नवास को लेकर हमेशा से उठते आए सवालों को फिर से बल मिल रहा है। साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्रों की संकरी घाटियों व नदियों के किनारे बसे गांवों का संवेदनशीलता को देखते हुए उनका भूगर्भीय सर्वे किए जाने की बात भी प्रमुखता से सामने आ रही है। इन क्षेत्रों का व्यापक अध्ययन के बाद यहां रह रहे लोगों का यदि पुर्नवास किया जाता है तो इससे हिमालयी क्षेत्र में आपदा की घटनाओं के दौरान होने वाले नुकसान व जनहानि को कम किया जा सकता है।
इस बार भी सरकार ने सुमगढ़ में हुए हादसे के दौरान राज्य के सौ से अधिक गांवों का पुर्नवास किए जाने की बात कही। पिछले वर्ष भी ला झकेला में हुई घटना के दौरान इस तरह की बातें सरकार के नुमाइंदों ने कही थी, लेकिन घटना के साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों के पुर्नवास की मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब देखना है कि उत्तराखंड सरकार इस घटना से सबक लेते हुए वास्तव में कोई कार्ययोजना बनाकर कार्य करती है या फिर इस घटना को भी पिछली घटनाओं की तरह भुला दिया जाता है।



हिमालयी क्षेत्र में हुई अबतक की बड़ी घटनाएं

                          घटना                                स्थान           मारे गए लोग   
जुलाई 1961                            धारचूला            12

अगस्त 1968                         तवाघाट             22

जुलाई 1973                          कर्मी                37

अगस्त 1989                        मदमहेश्वर         109

जुलाई  2000                        खेतगांव             5

अगस्त  2002                         गंगा घाटी टिहरी     29 

जुलाई 21, 2003                      डीडीहाट            4

जुलाई 6, 2004                             लालगगढ़           7

जुलाई 12, 2007                             दवपुरी              8

सितंबर 5  2007                         बरम, धारचूला       10

सितंबर 6, 2007                        लधार, धारचूला       5

जुलाई 17, 2008                        अमरुबैंड            17

अगस्त 8, 2009                        ला झकेला            45

अगस्त 18, 2010                      सुमगढ़ बागेश्वर       18