Friday, September 23, 2011

उत्तराखंड से भारतीय क्रिकेट को मिला एक ओर सितारा


भारतीय क्रिकेट टीम को नई पहचान दिलाने की तमन्ना

जूनियर इंडिया के कप्तान उन्मुक्त चंद से बातचीत

रुद्रपुर। जहांगीर राजू

भारतीय क्रिकेट टीम को नईं ऊंचाईयों को पहुंचाने वाले उत्तराखंड मूल के महेन्द्र सिंह धौनी के बाद राज्य से भारतीय क्रिकेट को उन्मुक्त चंद के रुप में एक और सितारा मिला है। उन्मुक्त 27 सितंबर से विशाखापट्टनम् में होने वाली चार देशों की वाडरेंगुलर सीरीज में जूनियर इंडियन क्रिकेट टीम का प्रतिनिधिव करेंगे। उन्मुक्त की तमन्ना है कि वह सीनियर क्रिकेट टीम में शामिल होकर भारतीय क्रिकेट को नईं ऊंचाईयों तक पहुंचाएं।
नेशनल क्रिकेट अकादमी बैंग्लुरु में प्रशिक्षण कैंप कर रहे उन्मुक्त ने दूरभाष पर बातचीत में कहा कि जूनियर सीनियर इंडियन क्रिकेट टीम का प्रतिनिधिव उत्तराखंड मूल के दो खिलाडियों के हाथों पर होना उत्तराखंड के लिए गर्व की बात है। उन्होंने बताया कि 27 सितंबर से विशाखापट्टनम् में होने वाली चार देशों की वाडरेंगुलर सिरीज में भारतीय जुनियर क्रिकेट टीम का प्रतिनिधिव करेंगे। जिसके लिए वह वर्तमान में नेशनल क्रिकेट अकादमी बैंग्लुरु में कैंप कर रहे हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद वह 23 सिंतबर को विशाखापट्टनम् के लिए रवाना होंगे। इस सिरीज में आस्ट्रेलिया, वेस्टेंडिज, श्रीलंका इंडिया की टीम प्रतिभाग करेगी। प्रतियोगिता में पहला मुकाबला 27 सितंबर को भारत वल आस्ट्रेलिया के बीच खेला जाएगा। उन्होंने बताया कि इस मुकाबले में भारतीय टीम सबसे मजबूत दावेदार के रुप में उभरकर सामने आएगी। उन्मुक्त ने बताया कि वह दिल्ली के टीम से बतौर ओपनर बल्लेबाज के रुप में खेलते हैं। आईपीएल में उन्होंने दिल्ली डेयरडवेल्स की टीम से चार मैच खेले। राइट आर्म बल्लेबाज होने के साथ ही वह आफ स्पीनर बॉलर भी हैं। उन्हंे जूनियर इंडिया की टीम में पिछले सत्र में सबसे अधिक रन बनाने का गौरव प्राप्त है। साथ ही रणजी ट्राफी के 5 मैचों में उन्होंने 400 रन बनाकर सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। जिसमें उनकी रेलेवेे के खिलाफ 15 रन की पारी भी शामिल है। उन्हें आईपीएल में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी के रुप में शामिल होने का भी गौरव प्राप्त है।
गांव की यादों से जुड़ा उन्मुक्त

रुद्रपुर। मूलरुप से पिथौरागढ़ जिले के खडकू भल्या निवासी 18 वर्षीय उन्मुक्त चंद की यादें आज भी उनके गांव से जुड़ी हुई हैं। उनके पिता भरत चंद ठाकुर ने पिथौरागढ़ डिग्री कालेज से पढ़ाई की। वर्तमान में वह दिल्ली स्थित सरकारी कालेज में प्राध्यापक हैं। उन्मुक्त अब भी हर साल अपने पिता के साथ साल में एक बार गांव जरुर जाता है। उसे गांव के बच्चों के साथ खेतों में क्रिकेट खेलना हमेशा याद रहता है। उन्मुक्त का कहना है कि वह चाहे जिस मुकाम तक भी पहुंचे, लेकिन वह हमेशा अपने गांव से जुड़े रहेग

खेल के साथ पढ़ाई भी जरुरी

रुद्रपुर। कड़ी मेहनत कर क्रिकेट में उल्लेखनीय प्रदर्शन करने वाले उन्मुक्त बताते हैं कि खेल के साथ पढ़ाई भी जरुरी है। इस वर्ष उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा 70 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण की। वर्तमान में वह दिल्ली के प्रतिष्ठित सेेंट स्टीफन कालेज में बीए प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उन्मुक्त बताते हैं कि वह क्रिकेट के साथ ही फिटनेश, योगा पढ़ाई पर भी खास ध्यान देते हैं।

















Friday, August 19, 2011

हथियार खरीदने के लिए सहजनवा में लूटी थी ट्रेन

अंग्रेजों ने तीन बार सुनायी थी कालापानी की सजा

जेल में थे तो पत्नी व बेटी की हो गयी थी मौत

स्वतंत्रता सेनानी भगवान प्रसाद शुक्ला से संस्मरण
                 
                                (रुद्रपुर से जहांगीर राजू)

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान प्रसाद शुक्ला
शहीद भगत सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल के आजादी के सपने को आगे बढ़ाने के लिए सशस्त्र क्रांति के जरिए आजादी के आंदोलन में कूदे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान प्रसाद शुक्ला ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर सहजनवा में ट्रेन रोक कर सरकारी खजाने से 10 हजार रुपये लूट लिए थे। जिसके बाद उन्होंने आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाया।  गांधी जी के सत्याग्रह से अंग्रेजों को कभी भी कोई भय नहीं रहा। देश की वर्तमान हालत को देखते हुए निराशा भरे शब्दों में वह कहते हैं कि देश को आज भी वास्तविक आजादी नहीं मिली। इस आजादी से उन्हें सिर्फ जेल से बाहर आने का मौका मिला, लेकिन शहीद आंदोलनकारियों के सपने अबतक पूरे नहीं हो पाए हैं। वह कहते हैं कि शहीद भगत सिंह व मार्क्स के साम्यवाद के रास्ते पर चलकर ही देश में अमीरी व गरीबी के बीच की दिवार को समाप्त कर असली आजादी प्राप्त की जा सकती है। देश में जब तक लोगों के पास व्यक्तिगत संपत्ति रहेगी तब तक  यह लड़ाई चलते ही रहेगी। वह कहते हैं कि भ्रष्टाचार आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन है। वह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाले हर संघर्ष का समर्थन करते हैं। वह कहते हैं कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए फिर से एक आंदोलन की जरुरत है। युवा इस आंदोलन को आगे बढ़ाकर देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला सकते हैं।
शहीद भगत सिंह का नाम जुबां पर आते ही 95 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान प्रसाद शुक्ला के आखों में आंसू आ जाते हैं। वह बताते हैं कि भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए ही उन्होंने 23 मार्च 1942 को उनके शहादत दिवस पर गोरखपुर जिले के सहजनवा क्षेत्र में अपने मित्र हरि प्रताप तिवारी, बाल स्वरुप शर्मा, कैलाश पति मिश्रा व बनारस से आए दो क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ट्रेन को लूटा था। इस ट्रेन से लूटे 10 हजार रुपये से उन्होंने हथियार खरीदर सशस्त्र क्रांति के आंदोलन को आगे बढ़ाया था। इस दौरान अंग्रेज सरकार ने उनपर मुकदमा चलाकर उन्हें तीन बार कालापानी की सजा सुनायी। सहजनवा कांस्प्रेसी, सहजनवा ट्रेन लूटकांड व लखनऊ कांस्प्रेसी के लिए उन्हें 75 साल जेल में रहने की सजा सुनायी गयी। इसके बाद से ही वह जेल से फरार चल रहे थे। 1943 में गिरतार होने के बाद वह पांच साल तक बरेली व लखनऊ जेल में रहे। इस दौरान उनकी पत्नी राजपति व सात माह की बेटी की मौत हो गयी। घर में हुए इस दुखद हादसे ने उन्हें हिलाकर रख दिया। बावजूद इसके वह जेल में रहकर ही साथियों की मदद से आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे। भगवान प्रसाद शुक्ला कहते हैं कि शहीद भगत सिंह व सुभाष चन्द्र बोस के आंदोलन के जरिए ही देश को आजादी मिली।

Wednesday, July 27, 2011

तराई की बेटी ने जमाया अमेरिका में कारोबार

कड़े संघर्ष के बाद आईटी कंपनी की मालकिन

रुद्रपुर। जहांगीर राजू

रुद्रपुर में पढ़ी-बढ़ी रसनीत कौर आज एक अमेरिकन आईटी कंपनी की मालिक है। अमेरिका और यूरोप में पैर जमाने के बाद रसनीत अब भारत में अपनी कंपनी को विस्तार दे रही है। चंडीगढ़ मंे उन्होंने इसके लिए बाकायदा दफ्तर खोल दिया है। यहां काम करने वाले 30 युवा रसनीत के सपने को सच करने में जुटे हुए है।

एक निजी स्कूल के कार्यक्रम में भाग लेने आई रसनीत ने बाताया कि उनके पिता यहां ऊधमंिसंहनगर और रामपुर के बॉर्डर पर स्थित चड्डा पेपर मिल में जीएम रहें। रसनीत की इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई रुद्रपुर के जेसीज पब्लिक स्कूल में हुई। 1997 में रुद्रपुर मंे इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद रसनीत ने अर्थशास़्त्र में एमए और फिर एमबीए किया। आईटी की दूर-दूर तक कोई समझ न होने के बावजूद रसनीत ने 2002 में अमेरिका में बेल्वो के नाम से आईटी कंपनी शुरू की।  अमेरिका के डेलोस शहर में इसका मुख्यालय बनाया। रसनीत बताती है कि कंपनी को अपने पैरों में खड़ा करने के लिए उन्होंने 10 साल मेहनत की। आखिर मेहन रंग लायी और आज वह आईटी आटोमिशन के साथ प्रिंट व मेल इंडस्ट्री के क्षेत्र में काम कर रही है।
इस समय वह जिराक्स समेत दुनिया की 500 कंपनियों के बाद यूरोप में  अपनी कंपनी का काम बढ़ाने के बाद रसनीत ने अब चंडीगढ़ में भी अपना दफ्तर बना लिया है। इस दफ्तर में उन्होंने 30 से अधिक युवाओं को रोजगार दिया है।
उत्तराखंड से जुड़े रहने की तमन्ना
रसनीत कहती है, आज जो भी हू, उसमें रुद्रपुर और उत्तराखण्ड का विशेष योगदान है। इसलिए उत्तराखण्ड में कंपनी का काम शुरू करके यहां की सेवा करने की तमन्ना है। उन्हांेने कहा कि उत्तराखंड में औद्योगिक विकास के साथ ही आईटी इंडस्ट्री के विकास की काफी संभावना है। सरकार को चाहिए  की वह बड़ी आईटी कंपनियों को निवेश के लिए यहां आकर्षित करें।

Friday, July 8, 2011

विधवा को परिवार बसाने की इजाजत क्यों नहीं ?

चंडीपुर गांव में विधवा हुई युवक के साथ जान देने को  मजबूर
                                                            
                                                   (रुद्रपुर से जहांगीर राजू)

शीला
 चंडीपुर गांव में हुई प्रेमी युगल की आत्महत्या की घटना कई सवाल छोडक़र गयी है। इस घटना से जहां बेगुनाह हरिदासी हाथ की मेहंदी सुखने से पहले ही बेवा हो गयी वहीं शीला की मौत से उसकी पांच साल की बच्ची हमेशा के लिए अनाथ हो गयी है। यह घटना एक विधवा महिला को बहु के रुप में स्वीकार नहीं करने वाली सामाजिक मान्यताओं को कटघरे में खड़ा कर गयी है। साथ ही यह सवाल भी छोड़ गयी है कि विधवा महिला को परिवार बसाने की इजाजत क्यों नहीं है।
चंडीपुर गांव के युवक प्रशान्त का अपराध यही था कि उसने गांव की विधवा महिला शीला से प्रेम किया था।  प्रशान्त का यह रिश्ता न तो उसके परिजनों को स्वीकार था और नहीं समाज के लोग इस रिश्ते के पक्ष में थे। जिसके चलते प्रशान्त के परिजनों ने उसका हरिदासी से जबरन विवाह करा दिया। लोक लाज के चलते प्रशान्त वैवाहिक कार्यक्रम में तो शामिल हो गया, लेकिन वह अपने नए साथी के साथ दो गज का फासला तक तय नहीं कर पाया। जिसके चलते उसने शीला के साथ मिलकर सल्फास खा लिया और दोनों इस दुनिया को हमेशा के लिए छोडक़र चले गए। दोनों की मौत के बाद प्रशान्त की पत्नी हरिदासी व शीला की पांच साल की बेटी काली सामाजिक मान्यताओं के भेंट चढ़ गए हैं, जहां एक विधवा महिला को परिवार बसाने की इजाजत नहीं दी जाती है।  
प्रशान्त
   गांव के युवा परितोष मंडल कहते हैं कि यदि शीला व प्रशान्त का विवाह हो गया होता तो आज नहीं हरिदासी विधवा होती और नहीं काली को अनाथ बनना पढ़ता। प्रशान्त व शीला के रिश्ते से मासूम बच्ची काली को नया जीेवन मिलता। लेकिन समाज के लोगों ने दोनों के रिश्ते को आगे नहीं बढऩे दिया। समाज के लोगों ने ऐसे रिश्ते को अपनाया, जिसमें दो लोग हमेशा के लिए बेसहारा हो गए हैं, लेकिन उस रिश्ते को परवान नहीं चढऩे दिया जिससे पांच साल की बच्ची काली को नया जीवन मिलता। परिमल राय कहते हैं कि प्रशान्त व शीला की मौत हमेशा सामाजिक मान्यताओं की दुहाई देने वाली व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर गयी है।
हरिदासी
 प्रशान्त व शीला की मौत से जहां युवा पीढ़ी नई दिशा में सोचने को मजबूर है वहीं सामाजिक मान्यताओं की बात करने वाले लोगों ने आज भी इस घटना से कोई सबक नहीं लिया है। इस प्रकार देखा जाए तो इस घटना से सबक लेते हुए समाज के लोगों ने नई व्यवस्था को कायम करने की पहल के लिए आगे आना होगा। जहां फिर से ऐसे रिश्ते को बढ़ावा नहीं दिया जाए जहां काली जैसी मासूम बच्ची फिर से अनाथ न हो और फिर से कोई विवाहिता हाथों की महेंदी उतरने से पहले बेवा हो जाए।


शीला के साथ काली
   असफलता बना अवसाद का कारण

रुद्रपुर। मनोवैज्ञानिक डा. रेखा जोशी बताती हैं कि विधवा को जीवन साथी बनाने का सपना देखने वाले युवा को समाज से मिले तिरस्कार के चलते उसे मिली असफलता ही उसके अवसाद का कारण बनी। जिसके चलते दोनों ने समाज से संघर्ष करने के बजाए गहरे अवसाद में आकर खुदकुशी कर ली। वह कहती हैं कि इस तरह की घटनाओं के लिए हमेशा सामाजिक व पारिवारिक स्थितियां जिम्मेदार होती हैं। इन दोनों के रिश्ते को यदि सामाजिक व पारिवारिक मान्यता मिल गयी होती तो शायद इस घटना से बचा जा सकता था। इस तरह की घटनाएं हमें सामाजिक मान्यताओं का फिर से मूल्यांकन करने की ओर प्रेरित करती हैं।


Thursday, July 7, 2011

उम्मीद जगाता ”टेंशन प्वाइंट“

- चार सौ से अधिक समस्याएं हो चुकी हैं प्रदर्शित

- टेंशन प्वाइंट नाम से ब्लॉग भी बनाया

चंदन बंगारी रामनगर

पैसे के पीछे अंधी दौड़ इंसान को अपने इर्द गिर्द फैले हुए भ्रष्टाचार व व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति जान बूझकर भी अनजान बना रही है, वहीं संवेदनहीनता के दौर में भी कुछ लोग अपने विचारों की अलख से ठहरे हुए पानी में हलचल पैदा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।
अल्मोड़ा जिले के भिक्यासैंण निवासी शंकर फुलारा भी उन्हीं में एक हैं, जिन्होने अपने कस्बे में टेंशन प्वाइंट नाम के प्रयोग के जरिये जमाने के दर्द व व्यवस्था में पनप रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने का अभियान छेड़ा हुआ है। दरअसल उनका यह टेंशन प्वाइंट और कुछ नहीं बल्कि कस्बे के बड़ियाली तिराहे पर लगा एक नोटिस बोर्ड है, जिसमें जनसमस्याओं के विवरण, सरकारी मशीनरी की बेरूखी और राजनीतिबाजों के झूठे वादों पर तीखे तंज कसे जाते हैं। जनता के बीच लोकप्रिय टेंशन प्वांइट पर लिखी इबारतों का तुरंत असर भी होता है। बीते पांच सालों से अब तक टेंशन प्वांइट में चार सौ से ज्यादा मुददे उठाए जा चुके हैं।
टेंशन प्वाइंट की शुरूआत के बारे में शंकर कहते हैं कि सितंबर 2006 में सरकार के प्रयासों से लगे चिकित्सा शिविर में कई डाक्टर पहुंचे थे। लेकिन अस्पताल में डाक्टर मौजूद नही थे। उन्होंने बाजार के चौक पर टेंशन प्वाइंट का बोर्ड लगाकर  पोस्टर लगाया ”सरकार जब चिकित्सा शिविर लगा सकती है तो दाल, आलू, सड़क, तेल, बिजली शिविर भी लगाने की जरूरत है“। इस पहल को जनता की सराहना मिलने के बाद टेंशन प्वाइंट का सफर अनवरत चल रहा है। वह बताते है कि 2008 में बैंक द्वारा ग्रामीणों को कागज पूरे होने के बावजूद लोन नहीं देने पर टेंशन प्वाइंट में लिखा कि ”सरकार ने योजनाएं लोगों को फंसाने के लिए बनाई हैं, भला हो बैंक कर्मियों का जो लोन नहीं देते है“। समस्या प्रदर्शित होने के फौरन बाद व्यवस्था सुधर गई।
पानी, बिजली, सड़क, पेंशन जैसी कई समस्याएं बोर्ड में प्रदर्शित होने पर अधिकारी उसका निदान करने लगे। पोस्टरों में स्थानीय समस्याओं, बुराईयों, पर्यावरण संरक्षण सहित राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों को रखने केअलावा नेताआंे की कार्यप्रणाली पर जमकर कटाक्ष किया जाता पोस्टर लगते ही उसे पढ़ने वालों की भीड़ जमा हो जाती है। यहां नये पोस्टर के लिए लोगों में उत्सुकता बनी रहती है, लोगों को टेंशन प्वाइंट अपनी समस्याओं के समाधान का सहारा लगने लगा है।
 वह .tensionpoint.blogspot.com  नाम से ब्लॉग भी चलाते है। भिक्यासैंण जैसे पहाड़ी कस्बे में भले ही इस पहल ने ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोरी हों, मगर उनका टेंशन प्वाइंट इलाके में चर्चित है।   सरकारी अधिकारियों के रवैये व भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों के लिए टेंशन प्वाइंट आशा की किरण है।

Wednesday, June 29, 2011

अरब देशों तक जाती हैं तराई में बनी रजाई

तीन हजार से अधिक महिलाओं को मिला रोजगार

घर बैठे रोजगार का जरिया बना हैंड कुल्टिंग
 
(रुद्रपुर से जहांगीर राजू)
दिनेशपुर में रजाई तैयार करती महिलाएं।

दिनेशपुर, रुद्रपुर, शाक्तिफार्म, खटीमा व आसपास के क्षेत्रों में बनने वाली रजाई अरब देशों तक निर्यात की जाती हैं। फैक्ट्री से सामान लाकर महिलाएं घर बैठे तगाई कर रजाईतैयार करती हैं। जिससे उन्हें हर रोज 150 से लेकर 250 रुपये तक की कमाई हो जाती है। क्षेत्र में तीन हजार से अधिक महिलाएं इस रोजगार से जुड़ी हुई हैं।बंगाली बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण दिनेशपुर में हैंड कुल्टिंग का सबसे अधिक काम होता है। यहां घर-घर में महिलाएं हैंड कुल्टिंग का कार्य करती हैं। सिंगल बैड की रजाई तैयार करने में उन्हें प्रति रजाई 8५ रुपये मिलते हैं। एक दिन में एक महिला तीन रजाई की तगाई कर 250 रुपये तक आसानी से कमा लेती हैं। इसी तरह से डबल बैड की रजाई की तगाई करने में दो महिलाओं को पूरा दिन लगा जाता है। यह रजाई तैयार कर उन्हें 450 रुपये मिलते हैं। इस प्रकार देखा जाए बगैर कोई लागत लगाये महिलाएं हैंड कुल्टिंग से 150 से लेकर 250 रुपये तक आसानी से कमा लेती हैं। रजाई तैयार करने के लिए उन्हें सारा सामान एक्सपोर्टर कंपनियों से घर पर ही मिल जाता है। दिनेशपुर के साथ ही रुद्रपुर, शक्तिफार्म, खटीमा व आसपास के क्षेत्रों में भी इसका कारोबार बढऩे लगा है। रुद्रपुर में भी दर्जनों घरों में हैंड कुल्टिंग का कार्य किया जाता है। इसके साथ ही यहां कई रजाई सेंटर चल रहे हैं। जहां आकर महिलाएं दिनभर रजाई का कार्य करती हैं।
एक्सपोर्ट क्वालिटी की रजाईयों की बढ़ती मांग को देखते हुए सिडकुल में रजाई बनाने वाली दो बड़ी कंपनियां स्थापित हो चुकी हैं। जिसमें एक हजार से अधिक महिलाएं काम करती हैं।

तराई की रजाईयों की विदेशों में मांग


रुद्रपुर। तराई में बनने एक्सपोर्ट क्वालिटी की रजाई की मांग लगातार बढ़ रही हैं। तराई में तैयार की जानी वाली इन रजाईयों को फैक्ट्री मालिक दिल्ली की मंडी तक भेजते हैं। जहां से एक्सपोर्टर उसे जापान, अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा व श्रीलंका आदि देशों को निर्यात करते हैं। विदेशों में जाने बिकने वाली इन रजाईयों की कीमत 5 से लेकर 25 हजार रुपये तक होती है। क्षेत्र में तैयार होने वाली खुबसूरत कढ़ाईदार रजाईयों की अरब देशों में सर्वाधिक मांग है।


एक्सपोर्टरों को मलाई, महिलाओं को मात्र रोटी

रुद्रपुर। रजाई उत्पादन में लगे बड़े एक्सपोर्टर इससे बड़ा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन इस काम में लगी दिन रात पसीना बहाने वाली महिलाओं को मात्र दो वक्त की रोटी ही आसानी से मिल पाती हैं। इस काम में एक्सपोर्टर जहां एक रजाई को विदेशों में बेचकर पांच हजार रुपये तक का मुनाफा कमाते हैं वहीं महिलाओं को मात्र 150- से 250 रुपये तक ही मिल पाते हैं। सरस्वती मंडल, नेहा वैद्य, श्यामली देवी बताती हैं कि दिनभर पसीना बहाने के बाद 150 रुपये तक की कमाई होती हैं। उन्होंने कहा कि इस रोजगार से जुड़ी महिलाओं की मजदूरी और अधिक बढऩी चाहिए।



Tuesday, June 21, 2011

किंग कोबरा शिशुओं को जन्म देगा

शर्मिला ऐसा की नयी  दुल्हन भी इसके सामने  कुछ  नही 

खतरनाक इतना क खूंखार  जानवर  भी इसके सामने पानी न मागे

कमल जगती, नैनीताल

 जी हाँ  हम  बात कर रहे हैं  हिन्दुस्तानी किंग कोबरा की जो इन दिनो नैनीताल के समीप  ज्युलिकोट  के  जंगलों  में अपने नये शिशुओ को जन्म देने के लिए एसुन्दर सा माहौल तैयार कर रही  है ! डीएफ़ओ बिजु लाल टीआर के अनुसार ये किंग  कोबर प्रजाति का साप  मण्डल  के पहाडी क्षेत्रो व तराई  भाभर में पाया जाता है !  किंग कोबरा जहाँ लोगों के लिए एक कौतुहल  के अलावा आस्था का प्रतीक है वहीँ कुछ लोग इसे प्राकर्तिक संतुलन बनाने  में मददगार  मानते हैं ! इनदिनों एक मादा  किंग कोबरा अपने बच्चे जनने के लिए अपना घोंसला नैनीताल के समीप ज्योलीकोट के जंगल में बना रही है जहाँ गांववासियों का जाना मना कर दिया गया है ! वो अपने  घोसले को माहौल के अनुसार तैयार कर रही है ! किंग कोबरा के लिए कहा जाता है की विश्व में ये ही केवल सांप है जो अपने लिए घोंसला बनाता है !  इसे  इस क्षेत्र के लिए सौभाग्य की बात मानी जा रही है, कोबरा को सिदुल-1 में बाघों के साथ रखा गया है ! ये विलुप्तप्राय प्राड़ी पहाड़ों व तराई भाबर क्षेत्र में बहुतायत में पाए जाते हैं !  
जानकारों के अनुसार ये शर्मीले जीव होते हैं और मनुष्यों को इन  सर्पों द्वारा काटे जानें के बहुत कम मामले सामने आए हैं ! ये सांप किसी आहट को सुनते ही चुपके से खिसक लेते हैं ! वन विभाग ने इस मौके को गंभीरता से लेते हुए इस प्रजनन क्रिया को मोनिटर  करने के लिए एक विशेषज्ञ को जिम्मेदारी सौपी है व इसे कैमरे में कैद करने की व्यवस्था की है ! जिम्मेदार व्यक्ति के अनुसार जहाँ प्रजनन के लिए ये सांप अपना माहौल तैयार कर रहा है वहीँ इसे देखने के लिए गाँव से लोग जमा हो रहे हैं जो इस क्रिया को रूप लेने में दिक्कत पैदा कर सकता है ! उन्होनें भी नज़र बनाये रखने के लिए कुछ दूर अपना ठिया बनाया है ! विभाग ने  ग्रामीणों के द्वारा लगाई गई भीड़ को कम करने के लिए तार बाड लगाएं हैं व उन्हें दूर रहने की  हिदायत दी जा रही है !
कुछ वर्ष पहले भी इसी प्रकार रामगढ में किंग कोबरा ने शिशुओं को जन्म दिया था जो काफी मशहूर हुआ था ! उनका कहना है की अगर ये प्रक्रिया सफलता पूर्वक पूर्ण हो जाती है तो प्राकर्ति के लिए अच्छा इशारा होगा ! ये सांप 12  से 18 फीट लम्बे होते हैं और अपने सीकर को मरने में इनका जहर का एक छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल होता है ! ये दिनभर खुले आम
 घूमते हैं और अन्य सापों की तरह बिलों में छुपकर नहीं रहते ! सबकुछ अगर ठीक रहा तो पांच छह दिनों में अच्छे परिणIम सामने आएंगे !