Thursday, September 30, 2010

बेजोड़ शिल्प व कलाकृतियों का नमूना है चंपावत का बालेश्वर मंदिर

कत्यूरी शासकों द्वारा निर्मित बालेश्वर मंदिर
                 हरीश उप्रेती करन, चंपावत

कभी चंद वंशीय राजाओं की राजधानी रहे चंपावत के प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण विभिन्न ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थल इसकी गौरवगाथा को खुद ही बयां करते हैं। इन स्थलों में मौजूद भित्ती चित्र व कलाकृतियां इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां मौजूद सभी स्थलों में से सबसे महत्वपूर्ण व पर्यटकांे के आकर्षण का केंद्र है बालेश्वर का मंदिर।

नगर की मुख्य सड़क से मात्र सौ मीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर शिल्प का बेजोड़ नमूना है। 12 वीं सदी में कत्यूरी शासकों द्वारा निर्मित बालेश्वर मंदिर समूह अपने समय में देश में प्रचलित सर्वोत्तम शिल्प शैलियों की अनूठी मिशाल है। माना जाता है कि चंपावत के अधिकांश शिल्प कत्यूरी राजवंश ने ही निर्मित किये थे। मंदिरों के समूह बालेश्वर परिसर में श्रृंगार की देवी चंपा व बाली, सुग्रीव सहित अन्य मंदिर भी हैं। मूल रूप से इसे शिव का मंदिर माना जाता है। जानकारों के मुताबिक बलुआ व ग्रेनाइड किस्म के पत्थरों से निर्मित मंदिर समूह की छतें संकुल पर्वतों की भांति निर्मित हैं। शिखर के ठीक नीचे गर्भ गृह बनाये गये हैं। मंदिरों में बाहरी तथा भीतरी दीवारों पर सुंदर कलात्मक मूर्तियां बनाई गयी हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले चार खंभों पर टिके मंडप इसको अलग ही रूप प्रदान करते हैं। मंडप की उल्टी छतों पर नृत्य करती अप्सराओं की मूर्तियां निर्मित की गई हैं।
मंडप के गर्भगृह के अंतराल में कई श्रृंगारिक मूर्तियां निर्मित है। गुंबदनुमा मंदिर के बीचों बीच शिवलिंग की स्थापना की गई है। मंदिर परिसर में कुछ समय व्यतीत करने व मूर्तियों को गौर से निहारने पर प्रतीत होता है मानों हम कहीं स्वर्ग लोक में हों और विभिन्न देवी-देवता, अप्सराएं व पशु-पक्षी क्रीडा कर रहे हों। इन मूर्तियों को निहारने पर ऐसा लगता है जैसे वो अभी तुरंत सजीव हो नृत्य कर उठेंगी। मंदिर की दीवारों पर नृत्य करती अप्सराएं व वाद्ययंत्र बजाती मूर्तियां पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करने लगती हैं। इन मूर्तियों की विभिन्न प्रकार की भाव भंगिमाएं ऐसी प्रतीत होती हैं मानों जीवन का सारा रंग इनमें ही डाल दिया गया हो। पत्थरों को छेनी व हथौड़े से काटकर बनाई गई ये बेजान मूर्तियां पास से देखने पर ऐसी लगती हैं जैसे तुरंत ही संवाद करने लगेंगी। इस मंदिर में निर्मित मूर्तियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हर किसी को अपने व्यक्तित्व की झलक देखने को मिलती है। मंदिर में निर्मित मूर्तियों में जहां विरह झेल रहे प्रेमी को अपनी प्रेमिका नजर आती है वहीं धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को अपने ईष्ट की झलक दिखाई देती है। 

Thursday, September 23, 2010

तराई में जाने कहां से आ गया एड्स

एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या 18१ पहुंची

सात वर्ष में 15 से अधिक एड्स रोगियों की मौत

           जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

तराई में एड्स के एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है। जिले में एड्स से अबतक 15 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। तराई में हो रही एड्स रोगियों की मौत से स्वास्थ्य विभाग की ओर से चलाए जा रहे जन जागरुकता अभियान को आईना दिखा दिया है। इस प्रकार देखा जाए तो औद्योगिक नगरी रुद्रपुर में एड्स का सिकंजा फैलता जा रहा है।

गौरतलब है कि रुद्रपुर व काशीपुर में शुरु हुए औद्योगिकरण के बाद से ही यहां एड्स रोगियों की संख्या में हर वर्ष बढ़ोत्तरी हो रही है। एड्स विशेषज्ञ डा. राकेश कुमार के मुताबिक जिले के शहरी क्षेत्रों में बाहरी लोगों का आवागमन बढऩे के कारण ही एड्स रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। जिसमें उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों व वाहन चालकों की संख्या अधिक होती है। देखा जाए तो वर्ष 2003 से जिले में राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल प्रोग्राम शुरू हुआ। कार्यक्रम शुरू होने के बाद वर्ष 2003 में जिले में एचआईवी संक्रामित रोगियों की संख्या मात्र 2 थी। वर्ष 2004 में यह संख्या 8, 2005 में 8, 2006 में 10, 2007 में 29, 2008 में 3२ वर्ष 2009 में 49 तथा वर्ष 2010  में अबतक जिले में एड्स संक्रामित रोगियों की संख्या 30 तक पहुंच गयी। इस प्रकार देखा जाए तो जिले में  अबतक एचआईवी पीड़ित 18१ रोगियों की पहचान हुई हैं, जिसमें से 15 से अधिक रोगियों की मौत हो चुकी है। जिले में मौजूद एचआईवी संक्रामित रोगियों में सबसे अधिक रोगी रुद्रपुर में है। इसके बाद काशीपुर में सबसे अधिक एचआईवी संक्रामित रोगी हैं।
 तराई में लगातार हो रही एड्स पीड़ित रोगियों की मौत ने सरकार की ओर से चलाए जा रहे जन जागरूकता अभियान की कलई खोलकर रख दी है। जानकारी के अभाव में एड्स रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जागरुकता न होने के कारण पिछले दिनों एक महिला को एड्स रोगी होने की जानकारी जिला अस्पताल में भर्ती होने के बाद मिली, जिसकी बाद में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गयी। तबतक महिला का पति व बेटा भी एड्स से संक्रामित हो चुका था। समय के रहते यदि महिला के परिवार को एड्स के खतरों का पता चल जाता तो शायद पति व बच्चे को एड्स रोगी होने से बचाया जा सकता था।
राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल कार्यक्र्रम के प्रोग्राम अधिकारी डा.आरके पांडे ने बताया कि रुद्रपुर व काशीपुर में औद्योगिकरण के चलते बाहरी क्षेत्रों से आने-जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। जिसके चलते क्षेत्र में एड्स रोगियों की संख्या बढ़ रही है। साथ ही जिले में रुद्रपुर के बाद जसपुर, काशीपुर व खटीमा में आईसीटीएल सेंटर खुलने के बाद अधिक रोगियों की पहचान हुई है।
 उन्होंने बताया कि जिले के किच्छा व सितारगंज क्षेत्र में आईसीटीएल सेटर खुलने के बाद इन रोगियों की संख्या में और अधिक बढ़ोत्तरी होगी। उन्होंने बताया कि एड्स की रोगथाम के लिए विभाग की ओर से जन जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं। साथ स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से सेक्स वर्करों को एड्स के प्रति जागरुक किया जा रहा है।


Monday, September 20, 2010

जल के जलजले से मालपा बनते पहाड़ के गांव

गांवों की संवेदनशीलता के प्रति जागरुकता जरुरी

भारी बरसात के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों मे हो रही जनहानि को रोकने के लिए व्यापक अध्ययन की जरुरत।
            
          जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

पर्वतीय क्षेत्रों में भारी वर्षा के दौरान गांवों में हो रहे हादसे हमें बार-बार मालपा की याद दिला रहे हैं। हाल ही में बागेश्वर जिले के सुमगढ़ गांव में 18 स्कूली बच्चों के जमींदोज होने की घटना को अभी हम भूले ही नहीं थे कि अल्मोड़ा में बाल्टा गांव में 13 व देवली में 10 व नैनीताल में 5 लोगों के जमींदोज हो जाने की घटना ने हमें एकबार फिर से पहाड़ की संवेेदनशीलता के बारे में आगाह कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सैकड़ों गांव भूस्खलन, बादल फटने व भूकंप की दृष्टि से बेदह संवेेदनशील हैं। बावजूद सरकार की किसी भी संस्था की ओर से पर्वतीय क्षेत्रों के संवेदनशील गांवों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया। यदि समय के रहते राज्य के संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन कर वहां रह रहे लोगों को पुर्नवासित करने की व्यवस्था नहीं की गयी तो पर्वतीय क्षेत्रों के अन्य संवेेदनशील गांवों को भी मालपा बनने से कोई नहीं रह पाएगा। इसके साथ ही राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के बड़े शहरों में बढ़ रहा जनसंख्या का दबोव व संवेदनशील क्षेत्रों के अंधाधुंध दोहन के चलते नैनीताल व अल्मोड़ा जैसे शहर खतरे की जद में आते जा रहे हैं। अल्मोड़ा शहर के विभिन्न क्षेत्रों में 200 से अधिक मकानों का क्षतिग्रस्त होना इसका ताजा उदाहरण हैं। यहां स्लोप वाले क्षेत्रों में मनमाने ढंग से कटान कर बड़े-बड़े भवनों को बनाया जाना इसका प्रमुख कारण हैं। इसी तरह का दबाव नैनीलात शहर में भी लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते नैनीताल की मालरोड लगातार झील की तरफ धंसती जा रही है।  ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जन जागरुकता नहीं होने व पर्वतीय क्षेत्रों के शहरों में बड़ रहे जनसंख्या के दबाव के कारण संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से गांवों व शहरों में हर वर्ष बरसात, भूस्खलन व भूकंप के चलते बड़े-बड़े हादसे हो रहे हैं। बावजूद इसके पर्वतीय क्षेत्रों के लाखों लोग संवेदनशील क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं।

अल्मोड़ा जिले के बाल्टा गांव में हुए भूस्खलन का दृश्य
ऐसे में शासन से उम्मीद की जाती है कि पर्वतीय क्षेत्रों गांवों व शहरों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए वहां का व्यापक भू-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। अध्ययन के दौरान जो क्षेत्र बादल फटने, भूस्खलन व  भूकंप की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं, उन क्षेत्रों के लोगों को सुरक्षित स्थानों में पुर्नवासित किए जाने की जरुरत है। इस स्थिति में यदि सरकार ने राज्य में जल के जलजले से हुई तबाही को फिर से भुला दिया तो पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में फिर से मालपा जैसे हादसे होते रहेंगे। ऐसे में शासन व प्रशासन चहकर भी कुछ नहीं कर पाएगा।




पहाड़ों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन जरुरी-पंत

रुद्रपुर। प्रमुख भू-वैज्ञानिक प्रो.चारू सी पंत बताते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों कि कई गांव, घाटियां व शहर भूकंप, भूस्खलन व बदलों के फटने की घटना के लिए बेहद संवेदनशील हैं। ऐसे में राज्य के संवेदनशील क्षेत्रों का भू-वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना जरुरी हैं। अध्ययन के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे लोगों को जागरुक करने व भूकंरोधी भवनों के निर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

 उन्होंने कहा कि यदि लोगों को संवेदनशील क्षेत्रों में होने वाली घटनाओं के प्रति यदि पहले से ही जागरुक कर दिया जाए तो इससे आपदा के दौरान होने वाली जनहानि को काफी कम किया जा सकता है। प्रो.पंत ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के बड़े शहरों में प्राकृतिक संसाधनों के मनमाने दोहन को कम करने की भी जरुत है। ऐसे शहरों का यदि सुनियोजित विकास होगा तो इन शहरों में बड़े हादसों की संभावनाओं को कम किया जा सकेगा।

Thursday, September 16, 2010

फिश एंगलिंग के लिए लोकप्रिय हो रहा है मरचूला

देशी-विदेशियों को खासा रिझा रहा है एंगलिंग का खेल

रामगंगा नदी में पाई जाने वाली महाशीर मछली अल्मोड़ा के मरचूला के तीन गांवों की तस्वीर बदल रही है। 

चंदन बंगारी
रामनगर

रामगंगा नदी में पाई जाने वाली महाशीर मछली अल्मोड़ा जिले के मरचूला के तीन गांवों को एक नई पहचान दे रही है। नदी किनारे बसा गुमनाम क्षेत्र मरचूला पर्यटन मानचित्र में अहम मुकाम हासिल कर रहा है। बीते कुछ सालों से यहां देशी-विदेशी सैलानियों की आमद तेजी से बढ़ रह़ी है। इसका श्रेय महाशीर नाम की एक र्स्पोट्स फिश को जाता है। यहां बहने वाली रामगंगा नदी में महाशीर की एंगलिंग का खेल सैलानियों के बीच खासा लोकप्रिय हो रहा है। जिसके चलते क्षेत्र में फिशिंग लॉजों और रिसोर्टों का निर्माण हो रहा है। पर्यटकों द्वारा एंगलिंग को बेहद पसंद किए जाने के कारण सरकार को जहां राजस्व का लाभ मिल रहा है, वहीं ग्रामीणों को भी इससे आर्थिक फायदा हो रहा है।
शिवालिक पर्वत श्रंखलाओं के बीच अल्मोड़ा व पौड़ी जिले की सीमा पर मरचूला गांव स्थित है। कुछ साल पहले तक गुमनाम रहे इस पूरे इलाके को गोल्डन महाशीर मछली ने नई पहचान दी है। साफ पानी में पाई जाने वाली महाशीर को नदियों की बाघिन भी कहा जाता है। रामगंगा में महाशीर मछली अंधाधुंध शिकार की वजह से खात्मे की कगार पर थी। मगर महाशीर संरक्षण की मुहिम को पर्यटन से जोड़ने से नदी में गोल्डन महाशीर की तादात बढ़ने लगी है। पांच साल पहले सरकार ने महाशीर संरक्षण को पर्यटकों व ग्रामीणों से जोडकर नदी का कुछ हिस्सा संरक्षण और एंगलिंग करने के लिए चार लोगों को लीज पर दिया था। लीज नियम के मुताबिक पर्यटकों से होने वाली आय का कुछ हिस्सा क्षेत्र के तीन गांवों बलोली, चिन्पानी, बकरोटी के ग्रामीणों व कुछ सरकार को देने की बात तय हुई थी। हालांकि चार में से दो ही लोग एंगलिंग का कार्य कर रहे है। मगर एंगलिंग के कारण गांवों की बंजर पड़ी जमीनों पर होटलों का विकास होने लगा है। र्स्पोटस फिश होने के कारण एंगलिंग का शौक सैलानियों में तेजी से पसंद किया जाने लगा। मछली को फिशिंग राड से पकड़ने, वजन नापने, इसके साथ फोटो खिंचाने व वापस नदी में छोड़ने का खेल एंगलिंग कहलाता है। देशी- विदेशी सैलानी यहां के फिशिंग लॉजों में ठहरकर एंगलिंग का लुत्फ उठा रहे है। 
एलिंग के लिए मरचूला आई फ्रांस निवासी फ्रेड बेंसले का कहना है कि बाघ, हाथी देखने के साथ ही एंगलिंग का अपना मजा है। इसको और विकसित करने व आने वाले पर्यटकांें को सुविधाएं देने की जरूरत है। मरचूला जो कभी पहाड़ की तलहटी में बसी उजाड़ जगह जैसा था। पिछले कुछ सालों से यहां करीब दर्जन भर रिसोर्ट और कैम्प बन चुके हैं। कार्बेट पार्क की सीमा पर होने व रामनगर से नजदीकी होने का भी इसे भरपूर फायदा मिल रहा है। नए पर्यटन गंतव्य के विकास से स्थानीय लोग भी खुश हैं। ग्रामीण मनवर नेगी का कहना है कि गांवों की जमीनें बंजर पड़ी हुई थी। एंगलिंग के चलते जहां महाशीर संरक्षण कार्य में भी तेजी आ रही है। शुरू में यहां कौड़ियों के दाम जमीनें बिकी, मगर अब जमीनों के अच्छे दाम मिलने व पर्यटन से जुड़कर ग्रामीणों की रोजी-रोटी चल रही है। रामगंगा के आसपास के तीन गांवों की ईको विकास समितियों को रॉड फीस और फिशिंग लॉज के टर्नओवर का एक हिस्सा भी मुनाफे के रूप में दिया जा रहा है।
 महानगरों की भागमभाग से दूर पहाड़, नदी, जंगल, पानी के बीच कुछ पल रहने की चाहत रखने वालों के लिए मरचूला नया आशियाना बन रहा है। तो फिर देर किस बात की, महाशीर के बहाने चल पड़े़ं तनाव मिटाने व कुछ पल सूकून के लिए मरचूला की ओर।

क्या फायदे है ग्रामीणों को 

- पर्यटकों से ली जाने वाली फिशिंग राड का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा 
- एंगलिग से होने वाली कुल आय का 5 प्रतिशत
- उत्तराखंड फारेस्ट डेवलपमेट कारपोरेशन के जरिए रूपया गांवों की ईको विकास समिति को जाता है।
                                                                                - गांवों के आसपास बने होटलों में मिलता है रोजगार

नैनीताल फिल्म महोत्सव अब 29 से 31 अक्टूबर तक

सार्थक सिनेमा को लोकप्रिय बनाने की उल्लेखनीय पहल

डा. प्रयाग जोशी व बी मोहन नेगी सम्मानित होंगे

गिर्दा व निर्मल पांडे को होगा समर्पित
स्थान-शैलेहाल नैनीताल
              
जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

जन संस्कृति मंच के सहयोग से युगमंच नैनीताल का तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव अब 29 से 31 अक्टूबर तक नैनीताल में होगा। यह फिल्म महोत्सव जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा व फिल्म अभिनेता निर्मल पांडे को समपिर्त रहेगा। इस महोत्सव में सार्थक सिनेमा को आम जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। महोत्सव में देशभर के प्रख्यात फिल्म व डाक्यूमेटरी निदेशक के पहुंचने की उम्मीद है।
युगमंच के निदेशक जहूर आलम ने बताया कि दुनियाभर के सार्थक सिनेमा को आम जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से नैनीताल में पिछले दो वर्षों से फिल्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फिल्म महोत्सव के बहाने देश व राज्य के साहित्यकारों, नाटककारों, चित्रकारों व फिल्मकारों को एक मंच में लाने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने बताया कि देश व दुनिया में डाक्यूमेंटरी के माध्यम से बन रही बेहतरीन फिल्मों को महोत्सव में प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही पहाड़ के बड़े फिल्म निर्देशकों की फिल्मों को भी दिखाया जाएगा। महोत्सव में प्रख्यात फिल्म निदेशक अल्मोड़ा निवासी वसुधा जोशी की फिल्म अल्मोडय़ान, वाइसेज फ्राम व फोर माया का प्रदर्शन होगा। पहाड़ की उभरती फिल्म निदेशक बेला नेगी की फीचर फिल्म दायें या बाएं का प्रदर्शन होगा। इस फिल्म में गिर्दा स्कूल के प्रिंसिपल की भूमिका में दिखाई देंगे। यह पूरी फिल्म पहाड़ की पृष्ठभूमि पर तैयार की गयी है। जो शीघ्र ही बड़े परदे पर प्रदर्शित होने वाली है। इस मौके पर प्रदीप पांडे की गिरीश तिवारी गिर्दा व निर्मल पांडे पर बनी डाक्यूमेंटरी का भी प्रदर्शन होगा। इस दौरान चित्रकार बी मोहन नेगी के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगायी जाएगी। नाटकों की कड़ी में मोहन थपलियाल रचित अक्ल बड़ी या भैंस का मंचन किया जाएगा। साथ ही 29 सितंबर को बच्चों के सत्र के रुप में बाल फिल्मों का मंचन होगा।
महोत्सव में प्रसिद्ध साहित्यकार डा.प्रयाग जोशी व चित्रकार बी मोहन नेगी को सम्मानित किया जाएगा। महोत्सव में असम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण मुख्य वक्ता के रुप में मौजूद रहेंगे। इस दौरान प्रख्यात फिल्म निदेशकों के बीच फिल्मों व डाक्यूमेंटरी को लेकर चर्चा भी की जाएगी। महोत्सव में फिल्म निदेशक संजय काक, राजीव कुमार, परेश कांदार, दवरंजन सारंगी, अजय पीबी, पंकज चतुर्वेदी, साहित्यकार वीरेन्द्र डंगवाल, पद्मश्री डा.शेखर पाठक, बल्ली सिंह चीमा, अजय कुमार, अजय भारद्वाज आदि भागीदारी करेंगे। 
फिल्म महोत्सव संजय जोशी की देखरेख मे सम्पन्न होगा।

Wednesday, September 15, 2010

उत्तराखण्ड की संस्कृति के प्रसार को समर्पित “मेरा पहाड़” नेटवर्क

इन्टरनेट पर अब उपलब्ध है उत्तराखण्ड के तीज-त्यौहारों की सम्पूर्ण जानकारी

 जहांगीर राजू (रुद्रपुर से)

किसी भी संस्कृति या समुदाय का आईना, उसकी धरोहरें, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य, संस्कृति, बोली-भाषा, संगीत इत्यादि होता है। मेरा पहाड़ डाट काम नेटवर्क (MeraPahad.com and www.apnauttarakhand.com/) भी भारत के एक राज्य उत्तराखण्ड को समर्पित है।
उत्तराखण्ड की सामाजिकता, संस्कृति और पौराणिकता बहुत ही समृद्ध रही है। युगों-युगान्तरों से अनेक ऋषि-मुनि ही नहीं बल्कि अनेक धर्मों, संस्कृतियों के प्रवर्तकों और अनुयायियों का तपस्थल यहां पर रहा है। यहीं पर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर शेष दुनिया को उससे परिचित कराया है।
उत्तराखण्ड की इसी समृद्ध, पौराणिक एवं प्रमाणिक विरासत को सहेजने के उद्देश्य से मेरा पहाड़ नेटवर्क” ने यह प्रयास प्रारम्भ किया है। भविष्य में वेद-पुराणों की तरह इंटरनेट भी सभी चीजों को सहेजने का एक  सुगम और सहज माध्यम बन जायेगा। आधुनिक भूमंडलीकरण के दौर में सभी संस्कृतियों का सामाजिक ताना बाना, अपनी जड़ों से दिनोंदिन दूर होता चला जा रहा है और उत्तराखण्ड, जहां रोजी-रोटी के पलायन करना एक मजबूरी है। वहां के लोग बाहर आकर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति और परम्पराओं से स्वतः ही दूर होते चले जा रहे हैं।

उत्तराखण्ड से बाहर देश-विदेश में रह रहे लोगों को अपने पहाड़ की जड़ों से जोड़कर रखने और उत्तराखंड के बारे में और अधिक जानने के उत्सुक उत्तराखंड प्रेमियों के लिये मेरा पहाड़ नेटवर्क” ने यह प्रयास शुरु किया। हर छह कोस में बोली, पानी और रीति-रिवाजों में थोड़ा सा अन्तर आ ही जाता है। तो ई-ग्रुप और फोरम ही ऐसे माध्यम है, जिसमें हर आम उत्तराखण्ड प्रेमी, एक सदस्य बनकर अपने इलाके की बोली, रिवाज, त्योहारों आदि से हमें परिचित कराता है और ग्रुप/ फोरम के माध्यम से वह सबको सुलभ हो जाता है। मेरा पहाड़ नेटवर्क” का प्रयास है कि हम अधिक से अधिक उत्तराखंड प्रेमियों को इससे जोड़े और अधिक से अधिक प्रमाणिक जानकारी हमारे फोरम के माध्यम से उपलब्ध हो। भविष्य में यह फोरम सम्पूर्ण उत्तराखण्ड की जानकारियों को अपने आप में समाहित कर लेगा और इस प्रकार इंटरनेट की विशाल दुनिया में संपूर्ण उत्तराखण्ड मेरा पहाड़ के रुप में सामने आ जायेगा। इन्ही जानकारियों को थोड़े और प्रमाणन के साथ अपनी अन्य साइट ApnaUttarakhand.com पर भी उपलब्ध कराया जाता है।

दूसरा कारण यह भी कि पहाड़ से आजीविका की तलाश में बाहर गया प्रवासी आज अपनी पहचान, अपनी जड़ों के जुड़ाव को जानने के लिये छटपटा रहा है। क्योंकि बाहर की दुनिया में भी कई छोटी-छोटी दुनिया अलग-अलग समुदाय के रुप में  हैं। जिनकी अपनी-अपनी रीति और संस्कृति है, उन सब को देखकर अब उत्तराखण्डी प्रवासी भी अपनी संस्कृति को जानने के लिये छटपटा रहा है। इसलिये उनको, उनकी जड़ों से, उनकी संस्कृति से, रीति-रिवाज, विकास की समस्याओं, पर्यटक और धार्मिक स्थलों, मेलों-त्यौहारों से परिचित कराने का हमारा छोटा सा प्रयास है, मेरा पहाड़।
 कोशिश यह की गयी है कि "मेरा पहाड़ नेटवर्क" की विभिन्न वेबसाइटों के माध्यम से उत्तराखण्ड के विभिन्न पहलुओं यथा - संस्कृति, तीज-त्यौहार, बोली-भाषा, व्यक्तित्व, लोक-संगीत, फिल्म, साहित्य और पर्यटन आदि के बारे में पुख्ता जानकारी उपलब्ध करायी जाये.

एक अन्य कारण यह है कि हर वर्ष लाखों पर्यटक हमारे उत्तराखंड की प्राकृतिक सुन्दरता को देखने के लिये यहाँ खिंचे चले आते हैं। उन लोगों को यहाँ आने से पहले बहुत सी जानकारियां नहीं होती। यदि वह इंटरनैट पर जानकारियाँ ढूंढते भी हैं तो उन्हें अधिंकाश प्रायोजित  जानकारी ही मिल पाती है जिस पर पूरी तरह से विश्वास करना कठिन सा होता है। मेरा पहाड़ नेटवर्क” का यह प्रयास है कि अपने सदस्यों के माध्यम से अपनी साइट्स पर ऐसी प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध करायें जो यहाँ आने वाले सैलानियों के लिये मार्ग-दर्शन का काम करें और वह वास्तविक उत्तराखंड को और नजदीक से जान समझ पायें।

विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी आपकी शंकाओं का समाधान करने के लिये विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से भी आपका परिचय करवाते हैं ताकि आप उनसे सीधे प्रश्न पूछ कर अपना उत्तर पा सकें। समय समय पर उत्तराखंड से जुड़े महत्वपूर्ण हस्तियों से लाइव चैट का आयोजन भी करवाया जाता  है जिसमें एक सदस्य के रूप में उनसे अपने प्रश्न पूछ सकते हैं।
मेरा पहाड़ नेटवर्क” सिर्फ इंटरनेट तक ही सीमित नहीं है, इंटरनेट के जरिये समान सोच के लोगों को जोड़क, उनका एक समूह बनाकर उत्तराखण्ड के लिये धरातल पर भी काम किया जा रहा है। इसी को ध्यान में रखकर एक उप-समूह बनाया गया क्रियेटिव उत्तराखण्ड-म्यर पहाड़, यह उत्तराखण्ड के युवाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और साहित्यिक मंच है। यह पुरानी पीढ़ी की विरासत को अगली पीढी तक पहुंचाने और इसे सहेजने का प्रयास करता है। पहाड़ से बाहर रह रहे युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और विभिन्न गतिविधियों से पहाड़ को जानने और समझने का प्रयास कर रहा है। विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा इसमें भागीदारी कर रहे हैं और इस आयोजन को आगे बढ़ाने के लिये हमें विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञों का आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। "Creative Uttarakhand - Myor Pahad" के युवा साथी उत्तराखण्ड के विभिन्न हिस्सों में जाकर कैरियर गाइडेन्स कैम्प तथा  मेडिकल कैम्प आयोजित करने के साथ ही उत्तराखण्ड की दिवंगत विभूतियों के पोस्टरों की एक श्रंखला भी चला रहा है जिसमें अब तक श्रीदेव सुमन, ऋषिबल्लभ सुन्दरियाल, डी.डी. पन्त एवं बिपिन त्रिपाठी सहित 8 विभूतियों के पोस्टर निकाले गये हैं. इसके अलावा "हिमालय बसाओ, हिमालय बचाओ" विचार गोष्टी श्रंखला के माध्यम से उत्तराखण्ड के ज्वलन्त मुद्दों पर बहस भी चलाई जा रही है. 

अपनी इस छोटी सी कोशिश से उत्तराखण्ड की समृद्ध धरोहर, सांस्कृतिक एकता, सामाजिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने, भूमंडलीकरण के दबाव में प्रभावित होते सामाजिक समरसता की अपनी परंपरा को बचाने और आर्थिक रुप से संपन्न पहाड़ की कल्पना को साकार रुप देने में सहभागी बनना चाहते हैं।
मेरा पहाड़ डाट काम नेटवर्क ने दिनांक 24 अप्रैल, 2010 को एक नई वेबसाईट हिसालू -उत्तराखण्ड सन्देश का लोकार्पण किया। जिसका शुभारम्भ उत्तराखण्ड सरकार के माननीय संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रकाश पन्त जी ने किया। www.hisalu.com उत्तराखण्ड से सम्बन्धित सभी वेबसाईटस और ब्लागों का संकलक (Aggregator) है। अर्थात उत्तराखण्ड से सम्बन्धित कोई भी नई जानकारी इण्टरनेट पर उपलब्ध होते ही आप इसे एक ही साईट www.hisalu.com पर देख पायेंगे। इसलिये अब इन्टरनेट द्वारा उत्तराखण्ड से जुड़ी अद्यतन (updated) जानकारी आप इस साईट के माध्यम से आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।
उत्तराखण्ड के प्रवासीजनों को उनकी संस्कृति से जोड़े रखने के लिये यह जरुरी है कि लोक संस्कृति के आधार पर मनाये जाने वाले त्यौहारों या महत्वपूर्ण तिथियों की जानकारी उनको हो, लेकिन परदेश में पंचांग आदि की सुविधा नहीं होती, अगर आप पंचांग ले भी आये तो बांचने की समस्या आती है। लेकिन इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया है। पूरे विश्व में फैले प्रवासी उत्तराखण्डी इस आनलाइन पंचांग का फायदा उठाकर समय पर आने वाले त्यौहारों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं और बड़े उत्साह से मकर संक्रान्ति, घी-संक्रान्त, दशौर (गंगा दशहरा), जने-पुन्युं तथा अन्य  पारम्परिक त्यौहारों को मनाते हैं. उत्तराखण्ड में प्रचलित वाणी भूषण, महिधर एवं रामदत्त पंचांगों के आधार पर माह भर के व्रत, त्यौहार, ग्रहण, महत्वपूर्ण तिथियों आदि की जानकारी आप पंचांग तथा त्यार-बार से ले सकते हैं।
और भी है बहुत कुछ जिसको शब्दों में व्यक्त कर पाना लगभग असंभव है, उसे तो आप साइट्स से जुड़ कर ही समझ सकते हैं   तो फिर अब देर क्यों, आइये जुड़िये, जानिये पहाड़ को, समझिये पहाड़ को और जुड़िये अपनी पौराणिक और महान संस्कृति से, जिसका जरिया है। www.MeraPahadForum.com

Saturday, September 11, 2010

स्मैक के नशे में धुंआ होती तराई की जवानी

तराई में सफेद नशे का काला कारोबार युवाओं को अपने शिकंजे में कसता जा रहा है।
                             (जहांगीर राजू रुद्रपुर से)

तराई में सफेद नशे का काला कारोबार लगातार फैलता जा रहा है। जिसके चलते स्मैक के नशे में तराई की जवानी धुंआ हो रही है। यहां के युवा अफीम, स्मैक व हेरोइन के नशे के शिकंजे में फंसते जा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि तराई में औद्योगिकरण बढऩे के साथ ही यहां चरस, अफीम स्मैक व हेरोइन का काला कारोबार भी अचानक बढ़ा है। ऊधमसिंह नगर जिले के नेपाल व उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़े रहने के कारण यहां बड़े पैमाने पर तस्कर सक्रिय हैं। यह तस्कर नेपाल व यूपी से स्मैक व हेरोइन लाकर तराई के युवाओं को नशे का शिकार बना रहे हैं। स्थिति यह है कि स्मैक व हेरोइन की तस्करी के चलते तराई में बढ़े पैमाने पर युवा सफेद नशे के आदि हो रहे है।
पुलिस के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो वर्ष 2009 में 51 लोगों को स्मैक, अफीम, हेरोइन व चरस की तस्करी करते पकड़ा गया। जिसमें 23 जनवरी 2009 को पंतनगर पुलिस ने बागपत उत्तर प्रदेश निवासी अरविलंद तोमर को 80 ग्राम हेरोइन के साथ गिरतार किया था। 26 जनवलरी को पंतनगर पुलिस ने सिडकुल तिराहे के नेवाबगंज बरेली निवासी नेम चन्द्र से 7.5 लाख रुपये की हेरोइन बरामद की थी। 2 फरवरी को खटीमा पुलिस ने देवरी निवासी कृष्ण सिंह को 450 ग्राम चरस के साथ गिरतार किया था। 17 फरवरी को महेन्द्र नगर कंजनपुर नेपाल निवासी राजेन्द्र अवस्थी को नशे के ब्यूरोकीन के 700 इनजैक्शन बरामद किए थे। 19 मार्च करतारपुर चौराहे के पास से पुलिस ने बगवाड़ा निवासी बलजीत सिंह को 37 पुडिय़ा अफीम के साथ गिरतार किया था। 21 अप्रैल को आवास निवास रुद्रपुर से पुलिस ने शिवपुरी बरेली निवासी लक्ष्मण सिंह को 18 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 
2 मई को पुलिस ने मिलक रामपुर निवासी हर प्रसाद को 650 ग्राम अफीम के साथ गिरतार किया था। 9 जून को ट्रांजिट कैंप में पुलिस ने केसीघाट झारखंड निवासी दिनेश को 2 किलो 750 ग्राम अफीम के साथ गिरतार किया था। 12 अगस्त को पुलिस ने सितारगंज निवासी गुरमेज सिंह को 25 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 13 अगस्त को हल्दुआ सितारंगज निवासी अजय कुमार को पुलिस ने 20 स्मैक की पुडिय़ा के साथ पकड़ा था। 14 सिंतबर को मलसी सितारंगज निवासी ऋषिपाल को पुलिस ने 20 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। इसी प्रकार वर्ष 2010 में अबतक पुलिस 35 लोगों को अफीम, चरस, स्मैक व हेरोइन के साथ गिरतार किया है। जिसमें 28 जनवरी काशीपुर पुलिस ने अशोक विहार निवासी सुरेश अरोरा को 26 किलो डोडा के चूरे के साथ गिरतार किया था। 10 मार्च पुलिस ने दिनेशपुर मोड़ में कृष्ण कुमार सैनी 900 ग्राम हेरोइन के साथ पकड़ा था। 27 मई पुलिस ने नानकमत्ता पुलिया के पास जसपुर निवासी कुलवंत सिंह को 5 स्मैक की पुडिय़ा के साथ गिरतार किया था। 6 जुलाई को दिनेशपुर पुलिस ने झारखंड निवासी प्रदीप को एक किलो अफीम के साथ गिरतार किया था।  12 जून को हल्दूआ सितारगंज निवासी भूप किशोर को पुलिस ने 25 पुडिय़ा स्मैक के साथ गिरतार किया था। 17 जून को पुलिस ने कानपुर निवासी जयप्रकाश को 70 पुडिय़ा स्मैक के साथ पकड़ा था। 23 जून हाथीखान सितारगंज निवासी गुरमेज सिंह को  पुलिस ने 15 पुडिय़ा स्मैक  के साथ पकड़ा था। 1 जुलाई सिंतारगंज में पुलिस ने बहेड़ी निवासी चन्द्रपाल को 30 स्मैक की पुडिय़ा के साथ पकड़ा था। 8 जुलाई को खटीमा पुलिस ने योगेश बाल्मिकी को 400 ग्राम स्मैक के साथ पकड़ा था।
इस प्रकार देखा जाए तो तराई में नशे का काला कारोबार लगातार फैलता जा रहा है। पुलिस की ओर से मामलों में की जा रही कार्रवाई के बाद भी यह करोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा है।