Saturday, September 11, 2010

आखिर कब मिलेगा ग्रामीणों को दीमकों से छुटकारा

अल्मोड़ा जिले के अंतिम गांव लंबाड़ी में दीमकों से बचाव के लिए वैज्ञानिकों द्वारा दी गई दवाइयां बेअसर हो रही है
                                              चंदन बंगारी रामनगर



एक दशक से भी अधिक समय से दीमकों के आतंक से झेल रहे अल्मोड़ा जिले के लंबाड़ी गांव के ग्रामीणों को इनसे निजात नही मिल सकी है। पंतनगर के वैज्ञानिकों द्वारा दी गई दवाइयों से दीमकों को कोई असर होता नही दिख रहा है। हर साल की तरह इस वर्ष भी बरसात में बढ़ती दीमकों की तादाद ग्रामीणों के लिए मुसीबत खड़ी कर रही है। गांव के कई घर गिरने की कगार पर पहंुच चुके है। ग्राम प्रधान का कहना है कि कई बार मांग करने के बावजूद सरकार ग्रामीणों को सरकारी इमदाद नही दे रही है। 
                    लंबाड़ी गांव में दीमकों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया एक भवन

समुद्र तल से 1300 मीटर ऊंचाई पर बसा लंबाड़ी अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे ब्लाक का अंतिम गांव है। करीब तीस साल पहले अचानक गांव में दीमक लगना शुरू हुआ था। ग्रामीणों द्वारा दीपकों को नजरअंदाज करने से इनकी संख्या लगातार बढ़ती रही। गांव में बने घरों के दरवाजे, खिड़कियों के साथ ही दीमकों ने खेत व खाने के अनाज तक को नही छोड़ा। दीमकों ने गांव के कई घरों को खंडहरों में तब्दील कर दिया। जिसके बाद गांव से पलायन होना शुरू हो गया। करीब 5 परिवार गांव छोड़कर चले गए है। गांव में वर्तमान में 40 परिवारों में से 2 को छोड़कर बाकी बीपीएल श्रेणी के अर्न्तगत आते है।
गांव की खेती व फल सब्जियों को भी दीमकों ने चौपट कर दिया है। दीमकों से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने नागपुर से केले व क्लोरोगार्ड दवाइयां मंगाकर वितरित की थी। मगर इसका दीमकों पर कोई असर नही हुआ। जनवरी 2009 में पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का दल गांव में आया था। दल के सर्वे में यह बात निकलकर आई थी कि गांव में बने मकानों में दीमकों का प्रकोप सबसे ज्यादा है। वहीं खेतों में 75 प्रतिशत व गंाव से सटे जंगल में 40 प्रतिशत दीमकों का प्रकोप मिला था। जिसके बाद वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों को दवाइयां दी थी। जिसका प्रभाव न होता देख 16-17 जुलाई 2010 को वैज्ञानिकों के दल ने गांव में बने 40 मकानों व 39 गौशालाओं में कीटनाशकों का छिड़काव किया था। 2 ग्रामीणों को छिड़काव का तरीका बताते हुए कुछ दवाइयां भी थी। दवा के छिड़काव से ग्रामीणों को कुछ रहत जरूर मिली थी। मगर बरसात के अधिक पड़ने से दीमकों की बढ़ती तादात ग्रामीणों के लिए मुसीबत खड़ी कर रही है।
अल्मोड़ा जिले से लंबाड़ी गांव में दीमकों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया एक भवन

 दवा का कोई असर इन पर होता नही दिख रहा है। गांव में बने 40 में से 15 मकान ढहने की कगार पर पहुंच गए है। गांव में रहने वालों की आर्थिक स्थिति देखते हुए विधायक से लोगों ने नया मकान बनाने के लिए मदद की मांग की। दो साल बाद केवल एक महिला पदमा देवी के नाम पर इंदिरा आवास मंजूर हुआ है। ग्राम प्रधान पदम सिंह का कहना है कि वैज्ञानिकों के छिड़काव से असर होता नही दिख रहा है। खेतों व घरों में दीमक फिर से दिखाई दे रहे है। वैज्ञानिक मकानों को दोबारा बनाने की बात कहते है। मगर गांव में अधिकांश परिवार गरीब होने के कारण मकान बनाने में सक्षम नही है। कई जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों के दौरों के बावजूद अभी तक ग्रामीणों को सरकारी मदद नही मिल पाई है। मुआवजे के लिए भेजे गए प्रस्तावों पर भी कोई अमल नही हो पाया है।

दीमकों को समूल नष्ट करना संभव नही

रामनगर। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बीएस बिष्ट का कहना है कि दीमकों का समूल नाश नही किया जा सकता है। इन पर नियंत्रण जरूर पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय से आतंक मचा रहे दीमकों को तुरंत नियंत्रित करना संभव नही है। वैज्ञानिक दीमकों की बढ़ती तादात को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे है। जिसके तहत बदल-बदल का दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक व आर्थिक जीवन में दीमकों के नुकसान को कम करने के प्रयास किए जा रहे है। उन्होंने कहा कि पहले घरों के भीतर लगे हुए दीमकों को नियंत्रित किया जा रहा है। उसके बाद ही खेतों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि कई दशक पुराने मकानों को नया बनाने की जरूरत है।  

सरकार पर गांव की अनदेखी का आरोप 

रामनगर। क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य पूरन रजवार का कहना है कि किसी भी सरकार ने गांव में दीमकों की समस्या पर ध्यान नही दिया। पंतनगर विश्वविद्यायल ने व्यक्तिगत रूचि लेकर गांव में सर्वे व दवाइयां बांटी है। ग्रामीण लगातार शासन-प्रशासन ने इसे आपदाग्रस्त गांव घोषित करने की मांग करते आ रहे है। मगर अब तक उनकी मांगे पूरी नही हो सकी है। जिसके चलते गांव में पलायन बढ़ रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों की दवाई से कुछ असर दीमकों पर पड़ रहा है। लेकिन सरकारी मदद अभी तक जीरो है। ग्रामीण नैन सिंह व बची सिंह का कहना है कि सरकारें गरीबों की नही सुनती है। इतने साल दीमकों के बीच गुजारे है। बाकी बचे साल भी ऐसे ही कट जाएंगे। हमारी बात सुनने वाला कोई नही है।  

 क्या है लंबाड़ी

 1300 मीटर की ऊंचाई पर बसा गांव 

 30 साल से दीमकों के आतंक से परेशान

 कई जनप्रतिनिधियों दौरे के बाद भी मदद नही मिली

 खंडहर में तब्दील हो रहे है घर 

 पलायन के बाद 40 परिवार रह गए गांव में

 वैज्ञानिकों की दवाएं भी बेअसर 


कृषि भूमि को बचाने के लिए कोई पहल नहीं


कृषि भूमि को बाढ़ लील रही है  वहीं मिट्टी माफिया भी खेतों को बंजर कर रहे हैं

सिल्ट निकालकर नदियों को गहरा कर बचाये जा सकते हैं खेत। 

राजेन्द्र तिवारी सितारगंज

तराई में नदियों का कटाव से हजारों एकड़ कृषि भूमि प्रतिवर्ष नदियों में समा रही है। वहीं मिट्टी माफिया भी उपजाऊं कृषि भूमि को पांच फिट तक खोदकर खेतों को बंजर कर रहे हैं। सरकारों की कोई नीति नहीं होने से कृषि भूमि का रकवा कम होता जा रहा है। सितारगंज क्षेत्र में ही बैगुल, सूखी, कैलाश देवहा कामन निहाई नदियों के भूकटाव से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि नदियों में समा गई है। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि में कई फिट सिल्ट भर गई है। जो कई वर्षों तक खेती योग्य नहीं रह गई है। नदियों के कटाव को रोकने के लिए सरकारों ने कोई पहल नहीं की। मंत्रीगण बरसात के दिनों में आश्वासन देकर कृषि भूमि को बचाने के लिए के आश्वासन दे जाते हैं। लेकिन ठोस नीति बनाने के लिए इन्हें भी फुर्सत ही नहीं दिखती




सितारगंज नानकमत्ता शक्तिफार्म क्षेत्र में नदियां हर वर्ष सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को बंजर करती जा रही है। लेकिन इन सबसे बेपरवाह सरकारी महकमे हर वर्ष बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा देता है। मनरेगा समेत तमाम योजनाओं को पैसा तब खर्च किया जाता है जब नदियां उफान पर होती हैं। बाढ़ इन कार्यों को एक ही झटके में बहा ले जाती है। पिछले चार वर्षों में नदियों की तबाही रोकने के लिए सिंचाई विभाग ने सितारगंज क्षेत्र की नदियों से तबाही रोकने के लिए करीब 25 करोड़ की योजनायें स्वीकृत कराई हैं। लेकिन धन आवंटित नहीं होने से कार्य समय पर नहीं हो पाये। जिसका खामियाजा गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी क्षेत्रवासी भुगत रहे हैं। गत वर्षों की भॉति इस वर्ष भी राजनेताओ व उच्चाधिकारियों के दौरे बाढग़्रस्त क्षेत्रों में हो रहे हैं। इस वर्ष भी बाढ़ का कारण नदियों में सिल्ट भरना बताया जा रहा है। अधिकारी पिछले वर्षों में भी इसी को कारण बताते आये हैं। लेकिन नदियों में से सिल्ट निकालकर गहरा व चौनलाईज नहीं किया। बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों प्रतिवर्ष खर्च हो रहे हैं। लेकिन नदियों को गहरा व चौनलाईज करने की योजनायें फाईलों में बन्द है।
यदि सरकार नदियों से सिल्ट निकालने की अनुमति दे दी गई होती तो तराई में उपजाऊं खेतों को खोदकर कृषि भूमि को बंजर कर रहे मिट्टी माफियाओं से भी निजात मिलती। जो हर वर्ष हजारों एकड़ कृषि भूमि में कई फिट मिट्टी खोदकर कृषि भूमि को बंजर कर रहे हैं। सिल्ट निकालने से सरकार को आय भी होती। नदियों में समाने वाले खेत भी सुरक्षित रहते। साथ ही प्रति वर्ष बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों के धन की बर्बादी भी रुकती।


Monday, September 6, 2010

उत्तराखंड में मारे गए सबसे अधिक गुलदार

राज्य में एक वर्ष में 29 गुलदार बने शिकार

टाइगर प्रोटेक्शन ईयर 2010 में सबसे अधिक बाघों के मारे जाने पर उठे सवाल
            (जहांगीर राजू, रुद्रपुर से)

वर्ष 2010 को भले ही टाइगर प्रोटेक्शन ईयर के रुप में मनाया जा रहा है। बावजूद इसके इस वर्ष में काफी संख्या में गुलदार के मारे जाने की घटनाएं हो रही है। स्थिति यह है कि टाइगर प्रोटेक्शन ईयर में उत्तराखंड में सबसे अधिक गुलदार व तेंदुए के मारे जाने के मामले सामने आए हैं। 
उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय वन एवं पयार्वरण मंत्रालय ने वर्ष 2010 को टाइगर प्रोटेक्शन ईयर के रुप में घोषित किया है। जिसके चलते देशभर में बाघों को बचाने के लिए मुहिम चली हुई है। देशभर में सेमिनार के माध्यम से लोगों को बाघों के संरक्षण के प्रति जागरुक किया जा रहा है। साथ ही बाघों की सुरक्षा के लिए तमाम नीतियां बनायी जा रही हैं। ऐेसे में देश में काफी संख्या में बाघों का मारा जाने से पूरी मुहिम का काफी धक्का लग रहा है। स्थिति यह है कि इस वर्ष देश में 240 गुलदार मारे हैं, जिसमें से 130 गुलदार को लोगों ने शिकार बनाया। इस दौरान मानव-पशु संघर्ष में 17, सडक़ दुर्घटनाओं मंे 19, वन विभाग द्वारा गोली मारने से 8, राहत कार्यों के दौरान  गुलदार मारे गए। साथ ही दो तेंदुओं को बड़े जानवरों ने मार डाला। सालभर में 58 गुलदार मारे हुए पाए गए।  
भारतीय वन्य जीव संरक्षण सोसायटी के खुलासे के मुताबिक उत्तराखंड में इस वर्ष सबसे अधिक बाघ मारे गए हैं। राज्य में इस वर्ष 29 गुलदार का शिकार हुआ। यहां चार बाघ मानव-पशु संघर्ष में मारे गए। इस साल राज्य में 15 गुलदार की खाल व हड्डी बरामद की गयी। उत्तराखंड की तरह महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में भी गुलदारों के मारे जाने की घटना बढ़ी है। महाराष्ट्र में इस वर्ष 15 गुलदार शिकारियों का शिकार बने। उत्तर प्रदेश में 13 व कर्नाटक में 12 गुलदार का शिकार हुआ।  
उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक परमजीत ङ्क्षसह के मुताबिक वर्ष 2007 में राज्य में 2300 गुलदार थे। इस साल बाघों की गणना के लिए रिपोर्ट तैयार की जा रही है। जिससे राज्य में गुलदार की सही संख्या का अंदाजा लगाया जा सकेगा।
कार्बेट टाइगर रिजर्व में रह चुके डा.पराग मधुकर धकाते बताते हैं इस वर्ष वन महकमे ने वन अपराधियों पर शिकंजा कसा है। जिसके चलते गुलदार के मारे जाने की बड़ी घटनाएं सामने नहीं आयी हैं। बावजूद इसके वन अपराधी कम नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि गुलदार का शिकार करने वाले सिंडिकेट को समाप्त करने के लिए देशव्यापी मुहिम चलाए जाने की जरुरत है।  







बाखूल बना लोगों के लिये कवच

21वीं शदी में भी वर्षों पूराना पहनावा पहन रहें है लोग
                                केशव भट्ट, बागेश्वर


बागेश्वर। जिस गांव में ना कोई फैक्ट्री हो और ना ही उस गांव के वाशिंदों को हो इसकी दरकार। बावजूद इसके भेड़-बकरियों के ऊन से ये लोग अपनी पुरातन कला से जो कपडा बनाते हैं वो इनके शरीर के लिए कवच का सा काम करता है। जो कि इन्हें सदियों से जाडे व बरसात से बचाता आ रहा है।
हॉं! यह बात है तहसील कपकोट के सुदूरवर्ती गांव की। जो आज भी इनकी धरोहर है। जहां पूरी दुनियां 21वीं शदी के फैशन में मस्त है वहीं बाखूल नाम से जाना जाने वाला और वास्कट की तरह दिखने वाला यह गणवेश मल्ला दानपुरवासियों के लिए सही मायने में शरीर का कवच है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पल-पल मौसम बदलते रहता है। खेती-बाडी, पशुओं को चराने के लिए जंगल ले जाने समेत रोजमर्रा के कामों में इन क्षेत्रों में मौसम हर पल बाधक बनते रहता है। यहां के वाशिंदों के बुर्जगों ने इस समस्या के निदान हेतु भेड़-बकरियों के ऊन से कताई कर कपड़ा बनाना शुरू किया था। इस परंपरा को लोग आज भी बखूवी निभा रहे हैं। जिले के झूनी गांव के खीम सिंह बताते हैं कि हाथ से ऊन कताई के बाद फिर चान से बुनाई कर कपड़ा बनाया जाता है। तैयार उस ऊन की पट्टी के कपड़े को पख्खा कहते हैं। डेढ फीट ऊंचा चूल्हा बनाकर उसके उप्पर ढाई फुट लम्बा तथा दो फीट चौड़ा समतल पत्थर रखा जाता है। ऊन के पाख्खे को आधा घ्ंाटा पहले पानी में भीगने के लिए छोड़ दिया जाता है। तब तक चुल्हे में रखे पत्थर को आग में खुब गर्म किया जाता है। 
बाद में पख्खा को उस पत्थर पर लगभग 2 घंटे तक पैर से  मसला जाता है। इससे उस कपड़े के सभी रूवां जल कर सख्त हो जाते हैं और कपड़े के बीच में सूक्ष्म छिद्र बंद हो जाते हैं। इस विधि से पख्खा मोटा होकर एक तरह से वाटरपूफ्र बन जाता है। बाद में हम इसे बच्चे, जवान व बुर्जुग के नाप के अनुरूप सिर्फ बाजू निकालने वाली जगह को काट कर स्वयं ही कताई के बने धागे से सिलाई करते हैं। खीम सिंह बताते हैं कि बाजार की छाता व बरसाती की अपेक्षा हमारा बनाया हुवा बाखुल काफी सुविधाजनक और शुद्व होता है। घर हों या जंगल में बाखुल पहना हो तो काम करते हुवे बेफिक्री रहती है। 6 माह तक हिमालयी बुग्यालों में बकरियों के साथ रहने वाले अनवालों के लिए तो यह कवच ही साबित होता है। बर्फबारी, आंधी तुफान और तेज बरसात में कंदराओं में रहते समय उनका यह कवच ही उन्हें बचाता है। 
दानपुर क्षेत्र का यह आविष्कार सीमांत क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गया। नई पीढी धीरे-धीरे इससे बिमुख होते जा रही है। उत्तराखंड के बागेश्वर, पिथौरागड़, चमोली और उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्रों में हस्तशिल्प की यह कला सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ने लगी है। हांलाकि सरकार ने हस्तशिलप के संरक्षण तथा विकास के लिए खादी बोर्ड, कुमाउं विकास मंड़ल, जन जाति निगम, उद्योग विभाग सहित कई संस्थाएं स्थापित की हैं। लेकिन इन संस्थाओं ने भी कभी ईमानदारी से इस कारोबार को विकसित करने के प्रयास नहीं किये। 



बरसात में कोबरा करेत व वाइपर है जान के दुश्मन

कोबरा सा जहर रखने वाला करेत प्रजाति का सांप घरों व गांदामों में भोजना की तलाश में आने के कारण इंसान को ज्यादा शिकार बनाता है
                                          चंदन बंगारी रामनगर


बरसात का मौसम आते ही लोगों के जेहन में बसे ज्यादा डर अगर किसी को होता है तो वह है सांपों का। हो भी क्यूं ना बरसात होते ही बिलों में पानी भरने की वजह से यह भारी संख्या में बाहर निकल आते है। भोजन की तलाश में बाहर निकले सापों का सामना अनायास ही इंसान से हो जाता है। तब इंसान व सांपों के बीच संघर्ष खड़ा होता है। यही वजह है कि बरसात के मौसम में अधिकांश स्नेक बाइट की घटनाएं सामने आती है। जिनमें कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है। 
बरसात के समय निकलने वाले प्रदेश में ज्यादातर सांपों में से तीन प्रजाति के ही सांप ज्यादा विषैले होते है। सांप पहली अनूसची में आते है। जिनमें पहला किंग कोबरा प्रजाति का सांप होता है। प्रदेश में कोबरा प्रजाति के इंडियन कोबरा व किंग कोबरा दोनों प्रकार के सांप पाए जाते है। फन वाले इस सांप को प्रजाति का राजा माना जाता है। कोबरा में न्यूरोटॉक्सिक टाइप जहर होता है। जहर की ज्यादा मात्रा होने के कारण यह अन्य सांपों की तुलना में बेहद खतरनाक माना जाता है। प्रदेश में कोबरा की दोनों प्रजातियां कार्बेट टाइगर रिजर्व, तराई, धारचुला, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत में ज्यादा पाई जाती है। खास तौर पर यह सांप जंगल में ही रहना ज्यादा पसंद करता है। इसलिए जंगल जाने वाले लोगों का ही सांप से सामना होता है। ज्यादातर मामलों में यह सांप लोगों पर ही भारी पड़ता है। अभी कुछ महीनों पहले विश्व का सबसे बड़ा किंग कोबरा रामनगर के चूनाखान के पास एक झरने में मृत मिला था। सांपों में दूसरी सबसे विषैला सांप करेत है। सांप के आधे धड़ से काले व सफेद प्रकार के घेरे बने हुए होते है। यह काफी शर्मीला व अचानक वार करने वाला सांप होता है। यह कब डसकर चले जाय इसका पता नही चल पाता है। यह सांप भोजन की तलाश में घरों व गोदामों में आ जाता है। यह अकेला बिस्तर तक पहुंच रखने वाला सांप है। कभी-कभी तो यह सांप कपड़ों, गददों, अल्मारी तक में मिल जाता है। जिसके कारण यह लोगों के लिए खतरा बन जाता है।
सबसे ज्यादा लोग इसी सांप के काटने से मौत के मुंह में चले जाते है। इस सांप का वैज्ञानिक नाम बुगेंरस है। इसमें भी कोबरा की तरह न्यूरोटॉक्सिन प्रकार का जहर पाया जाता है। करैत का जहर सीधे नर्वस सिस्टम पर असर करता है। जिस व्यक्ति को करैत डसता है उसे इसका अहसास तक नही होता है। इसके शिकार व्यक्ति को पेट में असहनीय दर्द उठता है। जिसके बाद उसका गला बंद होने लगता है। इस जहर इतना खतरनाक होता है कि कुछ ही मिनटों में इंसान की जान पर आफत बन आती है। कई बार तो इसका शिकार व्यक्ति पेट में दर्द की दवाई ले लेता है। बाद में जब इसके काटे होने का पता चलता है तो बहुत देर हो जाती है। इसके अलावा तीसरी प्रजाति वाइपर की होती है। निम्न हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला वाइपर का सिर तिकोना होता है। वहीं उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमालयन पिट वाइपर पाया जाता है। दोनों की प्रजाति के सांपों में हीमोटॉक्सिक प्रकार का जहर होता है। वहीं शांत प्रजाति का सांप पाइथन भी कभी कभार भोजन की तलाश में आबादी में घुस आता है। वहीं पानी में पाए जाने वाले सांप भी अक्सर लोगों को दिखाई देते है। मगर इन सांपों के काटने से इंसान का जीवन खतरे में नही पडता है। फिर भी इन सांपों के काटने पर डाक्टर को तुरंत दिखा लेना चाहिए। 

क्या कहते है डाक्टर

रामनगर। कार्बेट टाइगर रिजर्व में तैनात डा. सत्यप्रियगौतम भल्ला कहते है कि सांप के काटने पर इंसान को कतई घबराना नही चाहिए। घबराने से हार्ट पर असर होने पर जहर तेजी से शरीर में फैलता है। काटे वाली जगह पर पटटी न बांधे व इस स्थान को साबुन से धोने के बाद अस्पताल में उपचार कराएं। वहीं संयुक्त चिकित्सालय में तैनात डा. केके जोशी कहते है कि सांप काटने के मामले में एंटी स्नेक वेनम दिया जाता है। जरूर यह है कि मरीज कितनी जल्दी अस्पताल पहुंचता है। वह कहते है कि सांप काटने वाली जगह पर किसी भी प्रकार का कोई कट न करें।

क्षेत्र के लोग चंद्रसेन के ही सहारे 

रामनगर। रामनगर में रहने वाला चंद्रसेन पेशे से पेंटर है। उन्हें जहरीले सांप पकड़ने का अदभुत हुनर है। जनसेवा करने का शौक रखने वाले चंद्रसेन लंबे अरसे से सांप पकड़कर जंगल में छोड़ते आ रहे है। 31 अगस्त की रात उन्होंने कानियां स्थित नाले के पास से जहरीला किंग कोबरा पकड़ा। कोबरा लोगों के घरों में घुसने का प्रयास कर रहा था। ग्रामीणों ने कोबरा को पत्थर मारकर घायल कर दिया था। ग्रामीणों की सूचना पर चंद्रसेन ने कोबरा को पकड़ लिया। मगर वन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के चलते कोबरा इलाज के अभाव में मर गया। वहीं चंद्रसेन ने पैठपड़ाव स्थित राम अवतार के घर से 5 फुट का पाइथन पकड़ा। वहीं कोसी रोड स्थित स्टेट बैंके पास रहने वाले विमल महरोत्रा के घर कोबरा सांप घुस आया। जिसको चंद्रसेन ने पकड़ लिया। इसके अलावा भरतपुरी में भोपाल सिंह रमोला के घर से 3 फुट व चोरपानी में रहने वाली मुन्नी देवी के घर से 4 फुट लंबा पाइथन पकड़ा। हिम्मतपुर डोटियाल से उन्होंने देर रात 10 फुट लंबा अजगर पकड़ा है। उन्होंने इन जहरीले सांपों को पकड़कर घने जंगल में ले जाकर छोड़ दिया। चंद्रसेन करीब 15 सालों से लोगों के घरों में घुसे सांपों को पकड़कर जंगल में छोड़ते आ रहे है। मगर वन विभाग से किसी भी प्रकार का सहयोग न मिलने से वह बेहद दुखी है। उनका कहना है कि लोगों के बुलावे पर वह सांपों को घर से पकड़कर लाते है। मगर वन विभाग उन्हें कोई भी सुविधा उपलब्ध नही कराता है। जंगल में भी उन्हें सांप छोड़ने के लिए अपने वाहन से जाना पड़ता है। आज भी जब लोगों के घरों में सांप घुसता है तो लोग चंद्रसेन को ही याद करते है।  

वन कर्मियों को सिखाए सांप पकड़ने के गुर

रामनगर।  4 सितंबर को पहली बार पहल करते हुए वन परिसर के एफडीए हाल में कार्बेट पार्क प्रशासन के तत्वावधान में तराई पश्चिमी वन प्रभाग व कार्बेट के वनकर्मियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। प्रशिक्षण में कार्बेट के पशु चिकित्सक डा. सत्यप्रिय गौतम भल्ला ने कहा कि आमतौर पर बरसात के समय सांप ज्यादा निकलते है। प्रदेश में केवल तीन प्रजातियों कोबरा, वाइपर व करेत के ही सांप विषैले होते है। उन्होंने कहा कि वन कर्मियों का दायित्व है कि वह अन्य वन्यजीवों की तरह से ही सांपों को भी बचाएं। यह वन्यजीव प्रबंधन का ही एक हिस्सा है। अगर कहीं घायल सांप मिले तो उसे तुरंत पकड़कर उपचार के लिए डाक्टर के पास लेकर आए। उन्होंने बताया कि यंत्र से सांप पकड़ने में खासी सावधानियां बरतनी चाहिए। जरा सी असावधानी काफी घातक साबित हो सकती है। सांप को पकड़ने के बाद प्लास्टिक के बोरे में न रखें। क्यांेकि दम घुटने के कारण सांप मर जाते है। इस दौरान सांप की अन्य प्रजातियों व उनके व्यवहार के बारे में स्लाइड के माध्यम से बताया गया। इस दौरान 21 प्रशिक्षणार्थियों को सांप पकड़ने के लिए छड़ी, ग्लब्ज, चश्मा, हुक व किताब भी वितरित की गई।

प्रमुख घटनाएं 
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1 सितंबर रामनगर इलाके में एक ही दिन में कोबरा, वाइपर, पाइथन सहित 6 सांप पकड़े गए। इनमें से दो को छोड़कर सभी घरों से मिले 

.31 जुलाई को दिनेशपुर के दुर्गापुर में सांप के काटने से एक की मौत

.30 जुलाई को खटीमा व टनकपुर में चार लोगों को सांप ने काटा, एक महिला की मौत

.रामनगर के बैड़ाझाल में 26 जुलाई को सांप के काटने से दो चचरे भाइयों की मौत

.6 जून को रामनगर के गर्जिया गांव में रहने वाले महेश राम के घर से मिला 12 फुट लंबा किंग कोबरा    

Sunday, September 5, 2010

औद्योगिकरण के नाम पर बंजर हो रही तराई की भूमि


नए उद्योग नहीं लगने से विरान पडे़ औद्योगिक प्लाट

टाटा को नहीं दी गयी सितारगंज में पड़ी बंजर भूमि

तराई के सितारगंज में 1000  सिडकुल रुद्रपुर में 60 एकड़ भूमि बंजर पड़ी हुई है।

                            जहांगीर राजू रुद्रपुर 

तराई में पिछले छह माह से नए उद्योगों के लगने का सिलसिला बंद होने से औद्योगिक अस्थान की हजारों एकड़ भूमि बंजर होती जा रही है। कभी हरा सोना उगलने वाली उद्योगों के लिए खाली की गयी इस भूमि पर अब घास उग रही है।
 सितारगंज स्थित औद्योगिक क्षेत्र में बंजर पड़ी 107५ एकड़ भूमि
उल्लेखनीय है कि तराई में उद्योगों की स्थापना के लिए रुद्रपुर में 4 हजार एकड़ व सितारंगज में 2२26 एकड़ भूमि का औद्योगिक अस्थान के लिए अधीग्रहण किया गया था। जिसमें से सिडकुल रुद्रपुर में मार्च माह के बाद से नए उद्योगों की स्थापना नहीं होने के कारण 60 एकड़ भूमि बंजर हो चुकी है। यह भूमि भी पहले पंतनगर विश्विद्यालय के अधीन थी, जिसमें पहले धान व गेहूं की खेती की जाती थी। 

सितारगंज में सिडकुल को दी गयी दो 2२26 एकड़ से अधिक भूमि में से 107५ एकड़ भूमि बंजर पड़ी हुई है।  बताते चलें कि टाटा ने पहले उत्तराखंड सरकार से नैनो के प्लांट की स्थापना के लिए एक हजार एकड़ अतिरिक्त भूमि दिए जाने की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन खंडूरी सरकार ने टाटा को इतनी अधिक भूमि देने से इनकार कर दिया था। उस वक्त यदि यह भूमि टाटा को दे दी जाती तो आज टाटा नैनो का मदर प्लांट साणंद गुजरात में होने के बजाए उत्तराखंड में होता। सरकार के गलत फैसले के चलते यह भूमि अब पूरी तरह से बंजर हो चुकी है।
रुद्रपुर स्थित सिडुकल में लगे उद्योग


औद्योगिक पैकेज की समय सीमा समाप्त होने के बाद से क्षेत्र में नए उद्योग नहीं लग पाने के कारण इस भूमि में अब घास उग रही है। इस भूमि को पहले बासमती जोन के लिए सुरक्षित रखा गया था, लेकिन सिडुुकल को हस्तांतरित होने के बाद से ही यह जमीन बंजर पड़ी हुई है। इस भूमि में पहले धान, गन्ना, गेहूं की फसलें लहलहाती थी। सरकार की लापरवाही के चलते यह भूमि न तो औद्योगिक क्षेत्र के लिए विकसित हो सकी और नहीं इसका उपयोग बासमती जोन को विकसित करने के लिए किया जा सका। यदि टाटा नैनो का प्लांट इस क्षेत्र में लगता तो इससे राज्य सरकार को हर वर्ष दो हजार करोड़ से अधिक का राजस्व प्राप्त होता। अब शासन में बैठे बड़े अधिकारियों व सत्ताधारियों को कौन बताए कि बंजर भूमि से सरकार को कभी राजस्व नहीं मिलता।


Friday, September 3, 2010

उत्तराखंड में आर्किड के उत्पादन से स्वावलंबन

 राज्य में आर्किड के 240 प्राकृतिक प्रजातियां मौजूद

राज्य में उद्योग केे रुप में स्थापित हो सकती है खूबसूरत आर्किड के फूलों की खेती
                                            (जहांगीर राजू, रुद्रपुर से)

उत्तराखंड में खूबसूरत आर्किड के फूलों की खेती के माध्यम से बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार से जोड़ा जा सकता है। राज्य में आर्किड की 240 प्रजातियां मौजूद हैं। ऐसे में राज्य केे बेरोजगार युवाओं के लिए आर्किड क उत्पादन स्वावलंबन का माध्यम बन सकता है।
उल्लेखनीय है कि आर्किड के खूबसूरत फूलों की नार्थ इस्ट एशिया में बड़ी मांग है। विश्व भर में आर्किड के एक लाख से अधिक हाईब्रीड प्रजातियां हैं। उत्तराखंड की अगर बात की जाए तो  यहां की जलवायु आर्किड के उत्पादन के लिए उपयुक्त है। जिसके चलते राज्य में प्राकृतिक रुप से खूबसूरत आर्किड के फूलों की 240 प्रजातियां हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र में इस फूल की 750 प्रजातियां मौजूद हैं। ऐसे में राज्य में आर्किड के फूलों के उत्पादन को एक उद्योग के रुप दिया जा सकता है। आर्किड के फूलों का उत्पादन कर इसे बड़े पैमाने पर विदेशों के निर्यात किया जा सकता है।
आर्किड पर शोध कर चुके डा.डीएस जलाल बताते हैं कि आर्किड ग्रुप की लोरिकल्चर के क्षेत्र में पूरे विश्व  में काफी मांग है। उत्तराखंड में 30 से 40 फीसदी आद्रता वाले क्षेत्रों में आर्किड का बेहतर उत्पादन किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में सिमडियम व डैन्ड्रोबियम प्रजाति के आर्किड प्रमुखता से पाए जाते हैं। इन आर्किड की कट लोवर के रुप में विश्व के फूल बाजार में काफी मांग है। वर्तमान में भारत में यह फूल हांगकांग से आयात किया जा रहा है। इस फूल की एक स्टीक 25 से 30 रुपये में मिलती है। एक फूल में इसकी 8 से 10 स्टीक तक होती हैं। उत्तराखंड से इस आर्किड को भारी मात्रा में निर्यात किया जा सकता है। साथ ही पोलबाइन आर्किड को पाकेट लोवर के रुप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि टिशू कल्चर के माध्यम से आर्किड का राज्य में अच्छा उत्पादन किया जा सकता है। जिससे आर्किड की गुणवत्ता के साथ ही उसका उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। डा. जलाल ने बताया कि बंग्लौर, केरल में आर्किड के उत्पादन को एक उद्योग के रुप किया जा रहा है।
 उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में आर्किड को उद्योग के साथ ही पर्यटन से भी जोड़ा जा सकता है। डा. ललित तिवारी बताते हैं कि उत्तराखंड में आर्किड के उत्पादन को उद्योग का रुप दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बेहतर संभावना के बावजूद राज्य में आर्किड के कल्टीवेशन का कार्य अबतक शुरू नहीं हो पाया है। जबकि यहां पेड़ों में स्वेतरू पैदा होने वाली आर्किड की सैकड़ों प्राकृतिक प्रजातियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर जलवायु वाले क्षेत्र में आर्किड की खेती को मॉडल के रुप में कर उसे पूरे राज्य में विस्तार दिया जाना चाहिए।